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विकट स्थितियों में बेेबसी व लाचारी दिखाता शासनतंत्र

By संपादकीय 07.11.2016

Published on 08 Nov, 2016 12:40 PM.

जनता को 24 घंटे सरल, सुलभ व सामान्य सेवा प्रदान करने के प्रशासनिक दावे कितने खोखले हैं, साक्षात प्रमाण इन दिनों देखने को मिल रहा हैं। बीते एक महीने में ही पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का जनाजा निकल गया। एक तरफ फेस्टीवल छुSियों का जोर तो दूसरी तरफ कर्मचारी वर्ग की काम छोड़ हड़ताल ने जिस कदर आम जनता को परेशान किया है, उसका जबाव किसी अधिकारी वर्ग के पास नहीं है। सत्ता प्राप्ति की लालसा में बड़े-बड़े वायदे करने वाले राजनीतिज्ञ भी जनता से मुंह छिपाते फिर रहे हैं। सफाई सेवकों की हड़ताल से तो शहरों की स्थिति नारकीय बनाकर रख दी है। पहले सुविधा सैंटर का कर्मचारी वर्ग अपनी मांगों के समर्थन में काम छोड़कर हड़ताल पर गया तो काम प्रशासनिक कर्मचारियों के हाथ सौंप दिया गया लेकिन हद तो तब हो गई जब प्रशासनिक बाबू भी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर चले गए। अफसरों की लाचारी तो इस कदर देखने को मिली, मानों उन्होंने पहले कोई वैकल्पिक व्यवस्था को लेकर योजना ही नहीं बनाई। हां, सरकारी और निजि रेवेन्यू बचाने की दिशा में वैकल्पिक इंतजाम जरूर कर लिए लेकिन जनता के अन्य जरूरी कार्य प्रशासनिक अधिकारियों के लिए उतने अहम नहीं थे शायद। ठीक ऐसा ही हाल नगर निगमों का हो रखा है। सफाई सेवक अपनी मांगों पर अड़े तो सरकार अपनी लाचारी और बेबसी में फंसी है। परिणाम शहर की हर सड़क कूड़े से सट गई और वातावरण प्रदूषित होकर बीमारियों को बुला रहा है। विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और सत्तापक्ष को अपना राजपाठ बचाने के लिए आम जनता के गुस्से का शिकार होने से बचने के लिए ऐसी सूरतों में वैकल्पिक व्यवस्था करनी बेहद जरूरी है। जनता पुल, सड़कों व अन्य निर्माण कार्यों से चाहे खुश हो लेकिन जब उनका एक छोटा सा काम नहीं होता तो वह सब कुछ भूल सत्तापक्ष से नाराज होकर अपनी ताकत दिखा देता है। -जय हिन्द

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