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देश में जारी बदलाव के दौर में बदले जनप्रतिनिधि कानून

Published on 23 Feb, 2017 10:01 PM.

भारत की राजनीति दलों तथा परिवारवाद तक सिमटी हुई हैं। व्यवस्था कमजोर होने के कारण प्रभावशाली लोग या उनके परिजन ही खुलकर चुनाव मैदान में उतर रहे हैं। बेशक बदलते दौर में आम आदमी पार्टी का भी आगमन भी हुआ लेकिन पार्टी में आम आदमी ना के बराबर ही दिखाई दिए हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून की कमजोरी ही सामने आ रही है क्योंकि सुधार निचले स्तर पर जरूरी है लेकिन चुनाव आयोग केवल लोकसभा व विधानसभा के ही चुनाव करवाता है। यही कारण है कि सभी दल परिवारवाद में बंधे और हैैं और इनका आतंरिक लोकतंत्र शून्य है। ऐसे में वह जनता को क्या लोकतंत्र का आभास कराएंगे। यह बड़ा सवाल आज देश की जनता की जुबां पर टिका है। लोकतंत्र का अर्थ केवल पदाधिकारियों के चुनाव की औपचारिकता नहीं बल्कि उम्मीदवारों के चयन में भी होना चाहिए। इसमें हर स्तर के प्राथमिक और सक्रिय सदस्यों की सहभागिता होनी चाहिए। एक व्यक्ति एक पद का नियम होना चाहिए। जनप्रतिनिधि को दूसरे पद की चाहत में त्यागपत्र देने पर प्रतिबंध होना चाहिए। इसी तरह एक से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर रोक होनी चाहिए। वर्तमान कानून में सजायाफ्ता के चुनाव लड़ने पर भी प्रतिबंध नहीं है। बेशक अपील उसका अधिकार है लेकिन केसों का दशकों तक निपटारा न होना स्पष्ट है कि एक अपराधी को अपील की आड़ में जनता पर राज करने का हक मिला हुआ है। यह सबसे बड़ा कारण है कि जनता में से निकला व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनने से कन्नी काटता है क्योंकि अपराधी किस्म के नेता उनको अपने अपराधिक नैटवर्क से समाज में आगे ही नहीं आने देते। सवाल उठ रहें हैं कि अगर जमानत देते समय कोर्ट दोषी की कम से कम कस्टडी का प्रावधान तय कर सकती है, तो चुनाव लड़ने पर भी कम के कम अवधि की रोक होनी चाहिए। हालांकि न्यायपालिका का तमिलनाडू की मुख्यमंत्री बनने जा रही शशिकला पर मौके पर सजा सुनाना काफी लोकप्रियता लूट रहा है लेकिन निचले स्तर पर भी ऐसे सख्त फैंसले जनता का मनोबल मजबूत कर सकते हैं क्योंकि सुधार तो ग्रांऊड लेवल पर होना जरूरी है। ऐसा ही हाल परिवारवाद पर आधारित राजनीति में हो रहा है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व हालांकि इससे बचा हुआ है लेकिन कांग्रेस में गांधी परिवार हावी है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल बादल का भी यही हाल है जबकि उत्तर-प्रदेश में समाजवादी पार्टी में अब जाकर परिवारवाद खंडित हुआ है। हालांकि पहले यह काफी हावी रहा। मतदाता जागरूकता अभियान की सार्थकता तभी है जब मतदान अनिवार्य हो। बिना किसी उचित कारण के मतदान न करने पर सांकेतिक ही सही, जुर्माने का प्रावधान होना ही चाहिए। पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसैंस, राशन कार्ड, कालेज में प्रवेश आदि हेतु मतदान प्रमाण पत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। विशेष रूप से बड़े उद्योगपति, धनकुबेर, बड़े अफसर जो मतदान के लिए लाइन में नहीं लगना चाहते, उनका पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसैंस कैंसिल हो।- - - -जय हिन्द

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