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राजनीति के उद्देश्य की पूर्ति करके कानून की चुनौती बन रहे कथित बाबाओं के डेरों

By राजेश कपिल/संपादक

Published on 01 Sep, 2017 01:50 PM.

देश के कानून ने गत दिवस एक और हत्यारोपी ढोंगी बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह को यौन शोषण का दोषी करार देकर सलाखों के पीछे भेजा। हरियाणा राज्य के सिरसा क्षेत्र में डेरा सच्चा सौदा के नाम से डेरे का संचालन करने वाला दोषी करार कथित बाबा राम रहीम सिंह खुद को भगवान का संदेशवाहक और प्रेम की भावना का संचार करने वाला कहता था। बाबा का यह दावा देशवासियों ने उस समय ठुस्स होते देखा जब उनको दोषी करार देकर जेल में भेजे जाने पर उनके अनुयायियों ने पंचकूला क्षेत्र में आगजनी व पत्थरबाजी की, सुरक्षा व मीडिया कर्मियों पर हमले किए, सरकारी व निजि संपति को नुक्सान पहुंचाया। इससे यह साबित हो गया कि बाबा आज तक लोगों में प्यार का संदेश देने का ढोंग ही करता आ रहा था। वर्ना, ऐसे समय में उनके अनुयायी न्याय व भगवान पर भरोसा रख कर प्रार्थना सभा का आयोजन करते और शांति मार्च करते हुए देश की जनता को बाबा के दिए संस्कारों का प्रदर्शन करते। मगर ऐसा नहीं हुआ, उसका कारण भी लोगों को स्पष्ट हो गया कि बाबा ने अनुयायी नहीं बल्कि गुंडा तत्व पाल रखे थे जो अंदर ही अंदर एक बार फिर देश के कानून को अपनी रखैल बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे थे कि देश की न्यायिक प्रक्रिया ने इस मुहिम को तथ्यों व सबूतों के आधार पर दबोच लिया। कथित ढोंगी बाबा राम रहीम का असली चेहरा सामने आने के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि क्या राजनेताओं ने अपने वोटों के उद्देश्य की पूर्ति के लिए इन डेरों को इतनी महत्वत्ता दे रखी है कि यह खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं और इनकी सोच यहां तक बढ़ चुकी है कि यह न्यायपालिका को भी अपनी आधार संख्या से प्रभावित करने की कोशिश करने से संकोच नहीं कर रहे। इसमें कोई शक नहीं कि बीते दो दशक में पंजाब एवं हरियाणा में राजनीति के उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई सारे डेरे स्थापित हुए हैं। हालांकि डेरा व्यास व डेरा बल्लां अभी तक सच्चा सौदा जैसे कुख्यात डेरों की प्रवृति से कोसों दूर है जहां उद्देश्य को मानवता की सेवा तक सीमित रखा गया है। यह खुला सच है कि राजनेता वोटों की नीयत से इन दो डेरों पर भी आते हैं लेकिन जिस प्रकार अन्य डेरों से चुनावी समर्थन का ऐलान किया जाता रहा है, फिलहाल यहां ऐसा चलन नहीं है। भारत देश देवी-देवताओं, गुरु साहिबानों, पीर-पैंगम्बरों और महान आस्था स्थलों की धरती होने के कारण यहां के लोगों का झुकाव सदैव सेवाभाव व मानवता के कल्याण की तरफ रहा है। अब चूंकि खुद लोग अपने कार्य की व्यस्तता के चलते इतना कुछ नहीं कर पाते जिस का लाभ बाबा राम रहीम जैसे लोग उठाते हैं और मानवता की सेवा के कार्य शुरू करके सेवा भावना वाले लोगों को साथ जोड़ने में कामयाब हो जाते है। डेरों की भीड़ देखकर राजनेताओं से भी रहा नहीं जाता इसलिए वो भी वहां सिर झुकाने निकल पड़ते हैं जहां सेवा व श्रद्धाभाव के साथ लाखों-करोड़ों लोगों के सिर झुकते हैं। एक जमाने में मानवता की सेवा करने वाले स्थलों के संचालकों को एक दम सादा जीवन व्यतीत करते देखा जाता रहा है। कभी किसी डेरा को लेकर कोई विवाद, विवादित कृत्य, विवादित बयान या गतिविधि या फूहड़ता का प्रदर्शन देखने या सुनने तक को नहीं मिला। मगर बीते दो दशक के दौरान, यानि साफ तौर कहा जाए कि बाबा राम रहीम के डेरा संलाचन शुरू करने के बाद जिस प्रकार डेरे का आकार बढ़ा, वैसे ही बाबा के विवादित कृत्य एक-एक करके सामने आते गए। हैरत है कि बाबा की फूहड़ता के प्रदर्शन के बाद भी लोग उनके साथ किस सोच के साथ जुड़े रहे। यौन शोषण, हत्याएं, मारपीट, फिजूलखर्ची के आरोप सामने आने के बाद भी लोग मानों बाबा राम रहीम को न जाने किस आधार पर मानवता के सेवादार मानती रही। मौजूदा समय में यह एक गंभीर चिंता का विषय है। वैसे देखा जाए तो इस देश में बाबा और डेरा नाम की बीमारी की जड़ राजनेताओं की वोटों की ललक ही है जिसके लिए यह सारा ताना-बाना बुना जाता है। ऐसे में यह कहने का सही समय है कि इन बाबाओं व डेरों को लेकर भी जल्द कोई कानून या नियंत्रण अथारिटी स्थापित होनी चाहिए जो इनको भारतीय कानून के सीमा में रहकर अपने सेवाकार्य करने की ताकीद दे अन्यथा एक गया तो और पैदा होते जाएंगे। -जय हिन्द

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